Sunday, May 17, 2020

तपन

उगता है वो सूर्य सा चीर कर पर्वतो का सीना
खुद जलकर सीखाता है वो औरो को जीना

बहता है वो जल सी एक अविरल धारा
सींच कर बंजर जमीन को है उसने संवारा

रात के घने अंधेरे में चमकता आफताब हो
हर कोई पढ़ना चाहे ऐसी एक किताब हो

अश्को के बहते दरिया को मजबूत बांध बनाया
नीरस इस जीवन मे, सुरो का तार बजाया

नम जाये ये जमी, नम जाएगी ये धरा
रहे बरकरार ये गति, चलती रहे ये परंपरा

गर्व है हमे हम आपका अहम हिस्सा है
सक्सेस जिसकी आज एलआयसी मे किस्सा है

ये हमारी तरक्की दिन रात बढती रहे
उचाईयो की पताका पुरे भारत मे फहरती रहे

आशा है ये जूनून ऐसे ही चलता रहे
तरक्कि का ये दिया सालोसाल जलता रहे

ऐसे ही नही बनता कोई जीवन मे नंबर वन
समर्पण है, विचार है, सही है कितनी तपन

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