रेत के घर बनाते बनाते न जाने कब बड़े हो गए
ईंट और पत्थरों के घर सच मे खड़े हो गए
रेत के घर बनाते थे तोड़ते थे
खुशी और गम कोअपने हिसाब से मोड़ते थे
रूठने मनाने का एक अपना था एहसास
दोस्तो संग खिलखिलाने के पल थे वो खास
बढ़ा कुछ इस रफ्तार से ये जीवन
न जाने कब छुटे साथी , छुटा अपनापन
अब तो बस भाग दौड़ में कट रही है जिंदगी
जिम्मेदारियों के सामने बंट रही है जिंदगी
कभी कभी लगता है, क्यों हम बड़े हो गए
क्यों ये ईंट पत्थरो के घर खड़े हो गए
माना कच्चा ही सही पर , पर रेत का वो घर ही था अच्छा
इस मतलब भरी जिंदगी से ,
वो बेमतलब जीवन ही था सच्चा